Sunday, 25 February 2018

Sir C.V Raman

Chandrasekhar venctaraman was born on 07 November, 1888 at thiruvanaikkal. He completed his school at  age11 year. After completing school he get graduated from Presidency college,Madras. After completing education  he took  charge in financial services of India.
         In living Kolkata, in evening time he start working according to his interest in Indian Association for Cultivation of Science which was to set up by Dr. Mahendra lal sirkar. In his interested work Vibration, variety of musical instruments, harmless waves, diffraction etc. were included.
             In 1917, he was given the post of Professor by the University of Calcutta.In the year 1924, the Royal Society of London elected him Fellow for the Society  and in 1930 his work; They are now conferred with the Nobel Prize for Raman - effect.
 -Gautam vidyarthee Pathak

ALBERT EINSTEIN

Life of Albert Einstein was 1879-1955. Einstein was born in 1879 in Germany at Ulm. Albert Einstein was one of them who were considered universally greatest as physicist yet.
 . His awesome scientific life was start from published his three revolutionary [research letter] by him in 1905.  In his first research letter he proposed perception of quantum of light(Now it is called Photon) and used this perception in describing of symptoms of "Light electric affect" which was can't be verified by lasting of Radiations of wave theorem. In his second Research letter he developed theory of Brownian motion or pedesis . Which was practically confermed after some years. This theory submitted trusted proof of Atomic depiction of matter
-Gautam vidyarthee pathak

Thursday, 8 February 2018

Shoes

Shoes is our reputation.It gives us high respect  anyway  anytime.
                        Suppose you go to a party and you wear best clothes,wrest and your hair style is also very good but you have not wear a shoe or nice shoe then your personality can be affected.All other people look at your feet . When he saw that you have not wear a nice shoe then they will look at your face.It is really very bad feeling for you that time.
                                      In modern time demand of shoes increasing day - by - day. There are many types of shoes company in the market. But I prefer campus. Campus makes nice shoes. Base of campus shoes is softly so his shoes go longer than others in same ranges.

Tuesday, 6 February 2018

Dr.A.P.J abdul kalam

He was born in tamilnadu at Rameshwaram.His Father's name is Jainulabdin and his mother's name is Aashanka.He likes too much sweets which was made by his mother.
          He get his first prize in 26 january 1986 by the president of india Nilam sanjeev reddy.After success of   PSLV-3. The first prize name is 'Padmabhooshan'.When time he got the Padmabhooshan that time about of his friends who work with him on the same project was dissatisfied with him. because they think that he is not able to got it.
                         When Abul kalam Azad went to NASA for increase his ability.He saw a painting on a wall . Which was  related to Aeronautics.A man was firing many rockets against british army .Who was not a fair whereas he was unfair.After some time he knows that person .That person is Tipu Sultan.He was very happy because a indian ability is billowing in America.
                      -Wings of fire

Monday, 5 February 2018

Gaura(गौरा)

 गौरा मेरी बहिन के घर पली हुई गाय की वयः सन्धि तक पहुँची हुई बछिया थी। उसे इतने स्नेह और दुलार से पाला गया था कि यह अन्य गोवतसावों से कुछ विशिष्ट हो गयी थी।
                                    बहिन ने एक दिन कहा, तुम जो इतने पशु- पछी पाला करती हो -एक गाय क्यों नहीं पाल लेतीं,जिसका कुछ उपयोग हो। वास्तव में मेरी छोटी बहिन श्यामा अपनी लौकिक बुद्धि में मुझसे बहुत बड़ी हैं और बचपन से उनकी कर्मनिष्ठा तथा व्यवहारकुशलता की बहुत प्रशंसा होती रही है,विशेषतः मेरी तुलना में।
यदि वे आत्मविश्वास के साथ कुछ कहती हैं तो उनका विचार संक्रामक रोग के समान सुननेवाले को तत्काल प्रभावित करता है आश्चर्य नहीं,यदी उस दिन उनके उपयोगितावादी संबंधी भाषण ने मुझे इतना अधिक प्रभावित किया कि तत्काल उस सुझाव का कार्यान्वयन आवश्यक हो गया।
                  वैसे खाद्य की किसी भी समस्या के समाधान के लिए पशु-पक्षी पालना मुझे कभी नहीं रुचा। बकरी,कुक्कुट,मछली आदि पालने के मूल उद्देश्य का ध्यान आते ही मेरा मन विद्रोह करने लगता है। पर उस दिन मैंने ध्यानपूर्वक गौरा को देखा। पुष्ट लचीले पैर,भरे पुट्ठे,चिकनी भरी हुई पीठ,लम्बी सुडौल गर्दन,निकलती हुए छोटे-छोटे सींग,भीतर की लालिमा की झलक देते हुए कमल की दो अधखुली पंखुड़ियों जैसे कान,लम्बी और अन्तिम छोर पर काले सघन चामर का स्मरण दिलानेवाली पूँछ,सब कुछ सांचे में ढला हुआ सा था।गाय को मानो इटैलियन मार्बल में तराशकर उस पर ओप दी गई हो।
     स्वस्थ पशु के रोमों की सफेदी में एक विशेष चमक होती है। गौरा की अल उज्जवलता देखकर ऐसा लगा,मानो उसके रोमों पर अभ्रक का चूर्ण मल दिया गया हो,जिसके कारण जिधर आलोक पड़ता था,उधर विशेष चमक उतपन्न हो जाती थी।
                               गौरा को देखते ही मेरी पालने के संबंध में दुविधा निश्चय ही बदल गई।
गाय ज॒ब मेरे बंगले पर पहुँची,तब मेरे परिचितों और परिचारकों में श्रद्धा का ज्वर - सा उमड़ आया। उसे लाल - सफेद गुलाबों की माला पहनाई गई,केशर रोली का बड़ा - सा टिका लगाया गया, घी का चौमुखा दिया जलाकर आरती उतारी गई और उसे दही - पेड़ा पिलाया गया। उसका नामकरण हुआ गौरांगिनी या गौरा। पता नहीं ,इस पूजा-अर्चना का उस पर क्या प्रभाव पड़ा,परन्तु वह बहुत प्रसन्न जान पड़ी।उसकी बड़ी चमकीली आँखों में जब आरती के दिये की लो प्रतिफलित होकर झिलमिलाने लगी,तब कई दियों का भ्रम होने लगा। जान पड़ा जैसे रात में काली दिखनेवाली  लहर पर किसी ने कई दिये प्रकाशित कर दिये हों।
            गौरा वास्तव में बहुत प्रियदर्शनी थी,विशेषतः उसकी काली बिल्लौर आँखों का तरल सौन्दर्य तो दृष्टि को बांधकर स्थिर कर देता था। चौड़े उज्जवल माथे और लम्बे सांचे में ढले हुए मुख पर आँखें बर्फ में नीले जल के कुण्डों के समान लगती थीं। उनमें एक अनोखा विश्वास का भाव रहता था । गाय के नेत्रों में हिरन के नेत्रों जैसा चकित विस्मय न होकर एक आत्मीय विश्वास ही रहता है। उस पशु को मनुष्य ही नहीं ,निर्मम मृत्यु तक प्राप्त होती है, परन्तु उसकी आँखों के विश्वास का स्थान न विस्मय ले पाता है, न आतंक।
             महात्मा गाँधी ने ' गाय करुणा की कविता है',क्यों कहा, यह उसकी आँखें देखकर ही समझ में आ सकता है ।
                                                गौरा को अलस मन्थर गति से तुलना करने योग्य कम वस्तुएँ हैं। तीव्र गति में सौन्दर्य है;परन्तु वह मन्थर गति के सौन्दर्य को नहीं पाता । बाण की तीव्र गति क्षण भर के लिए दृष्टि में  चकाचौंध उत्पन्न कर सकती है ,परन्तु मन्द समीर से फूल का अपने वृन्त पर हौले - हौले हिलना दृष्टि का उत्सव है।
                   कुछ ही दिनों में वह सबसे इतनी हिलमिल गई कि अन्य पशु-पक्षी अपनी लघुता और उसकी विशालता का अन्तर भुल गए।कुत्ते - बिल्ली उसके पेट के नीचे और पैरों के बीच में खेलने लगे। वह स्थिर खड़ी रहकर और आँखें मुँदकर मानो उनके संपर्क - सुख की अनुभूति में खो जाती थी।
                हम सबको वह आवाज से नहीं पैर की आहत से भी पहचानने लगी थी। समय का इतना अधिक बोध उसे हो गया था कि मोटर के फाटक में प्रवेश करते ही बां - बां की ध्वनी से हमें पुकारने लगती। चाय नाश्ता तथा भोजन के समय से भी वह इतनी परिचित थी कि थोड़ी देर कुछ पाने की प्रतीक्षा करने के उपरान्त रंभा - रंभाकर घर सिर पर उठा लेती थी।
     उसका साहचर्यजनित लगाव,मानवीय स्नेह के समान ही निकटता चाहता था। निकट जाने पर सहलाने के लिए गर्दन बढ़ा देती,हाथ फेरने पर अपना मुख आश्वस्त भाव से कंधे पर रख कर आँखें मूंद लेती। जब उससे दूर जाने लगते,तब गर्दन घुमा - घुमाकर देखती रहती।आवश्यकता के लिए उसके पास ध्वनि थी,परन्तु उल्लास,दुः ख,उदासीनता,आकुलता आदी की अनेक छाया छवियां उसकी बड़ी और काली आँखों में तैरा करती थी।
          एक वर्ष के उपरान्त गौरा एक तुष्ट सुन्दर वत्स की माता बनी। वत्स अपने लाल रंग के कारण गेरू के पुतला जैसा जान पड़ता था। उसके माथे पर पान के आकार का श्वेत तिलक और चारों पैरों में खुरों के ऊपर सफेद वलय ऐसे लगते थे,मानो गेरू की बनी वत्समूर्ति को चाँदी के आभूषणों से अलंकृत कर दिया हो। बछड़े का नाम रखा गया लालमणी,परन्तु उसे सब लालू के नाम से पुकारने लगे। माता - पुत्र दोनों निकट रहने पर हिमराशि और जलते अंगारे का स्मरण कराते थे। अब हमारे घर में मानों दूग्ध - महोत्सव आरंभ हुआ। गौरा प्रातः-सायं बारह सेर के लगभग दूध देती थी, अतः लालमणि के लिए कई सेर छोड़ देने पर भी इतना अधिक शेष रहता था कि आसपास के बालगोपाल से लेकर कुत्ते-बिल्लियों ने तो एक अद्भुत दृश्य उपस्थित कर दिया था। दुग्ध दोहन के समय वे सब गौरा के सामने पंक्ति में बैठ जाते और महादेव उनके आगे उनके  खाने के लिए निश्चत बर्तन रख देता। किसी विशेष आयोजन पर आमंत्रित अतिथियों के सामने वे परम शिष्टता का परिचय देते हुए प्रतीक्षा करते रहते। फिर नाप - नापकर सबके पात्रों में दूध डाल दिया जाता,जिसे पीने के बाद वे एक बार फिर अपने-अपने स्वर में कृतज्ञता ज्ञापन-सा करते हुए गौरा के चारों ओर उछलने कूदने लगते। जब तक वेसब चले न जाते,गौरा प्रसन्न दृष्टि से उन्हें देखती रहती। जिस दिन उनके आने में विलम्ब होता वह रंभा-रंभाकर मानो उन्हें पुकारने लगती।
              पर अब दुग्ध दोहन की समस्या कोई स्थान समाधान चाहती थी। नौकरों में नागरिक तो दुहना जानते ही नहीं थे और जो गांव से आए थे,वह अनभ्यास के कारण यह कार्य इतना भूल चुके थे कि घंटों लगा देते थे। गौरा कै दूध देने के पूर्व जो ग्वाला हमारे यहाँ दूध देता था, जब उसने इस काम के लिए अपनी नियुक्ति के विषय में आग्रह किया,तब हमने अपनी समस्या का समाधान पा लिया।
                                                                              दो-तीन मास के उपरान्त गौरा ने दारा-चारा खाना बहुत कम कर दिया और वह उत्तरोत्तर दुर्बल शिथिल रहने लगी। चिन्तित होकर मैंने पशु चिकित्सकों को बुलाकर दिखाया। वे कई दिन तक अनेक प्रकार के निरिक्षण-परीक्षण,एक्स-रे आदी द्वारा रोग का निदान खोजते रहे।अंत में उन्होंने निर्णय दिया कि गाय को सुई खिला दी गई है,जो उसके रक्त संचार के साथ हृदय के पास पहुँच गई है। जब सुई हृदय के पार हो जाएगी,तब रक्त संचार रुकने से उसकी मृत्यु निश्चित है।
       
          मुझे कष्ट और आश्चर्य दोनों की अनुभूति हुई। सूई खिलाने का क्या तात्पर्य हो सकता ? दाना चारा तो हम स्वयं देखभाल कर देते हैं,परन्तु संभव है,उसी में सुई चली गई हो। पर डॉक्टर के उत्तर से ज्ञात हुआ की दाने चारे के साथ गई सुई गाय के मुख में ही छिदकर रह जाती है गुड़ के बड़ी डली के भीतर रखी सुई ही गले के नीचे उतर जाती है और अन्ततः रक्त संचार में मिलकर हृदय में पहुँच सकती है।अंत में एक ऐसा निर्मम सत्य उद्घाटित हुआ;जिसकी कल्पना भी मेरे लिए संभव नहीं थी। प्रायः कुछ ग्वाले ऐसे घरों में,जहाँ उनसे अधिक दुध लिया जाता है,गाय का आना सह नहीं पाते। अवसर मिलते ही वे गुड़ में लपेटकर सुई उसे खिलाकर उसकी असमय मृत्यु निश्चित कर देते हैं। गाय के मर जाने कपर उन घरों में वे पुनः दूध देने लगते हैं। सूई की बात ज्ञात होते ही ग्वाला एक प्रकार से अन्तर्धान हो गया,अतः संदेह का विश्वास में बदल जाना स्वाभाविक था। वैसे उसकी उपस्थिति में भी कोई कानूनी प्रमाण जुटाना असंभव था।
              तब गौरा का मृत्यु से संघर्ष आरंभ हुआ,जिसकी स्मृति मात्र से आज भी मन सिहर उठता है। डॉक्टरों ने कहा,गाय को सेव का रस पिलाया जाये,तो सुई पर कैल्सियम जम जाने और उसके न चुभने की संभावना है। अतः नित्य कई-कई सेर सेब का रस निकाला जाता और नली से गौरा को पिलाया जाता। शक्ति के लिए इंजेक्शन पर इंजेक्शन दिए जाते। पशुओं के इंजेक्शन केलिए शुजे के समान बहुत लम्बी मोटी सिरिन्ज तथा बड़ी बोतल भर दवा की आवश्यकता होती है।अतः वह इंजेक्शन भी अपनेआप में 'शल्य क्रिया' जैसा यातनामय हो जाता था। पर गौरा अत्यन्त शक्ति से बाहर और भीतर,दोनों ओर की चुभन और पीड़ा सहती थी। कभी-कभी उसकी सुन्दर पर उदास आँखों के कोनों में पानी की दो बुँदें झलकने लगती थीं।
         अब वह उठ नहीं पात थी,परन्तु मेरे पास पहुँचते ही उसकी आँखों में प्रसन्नता की छाया-सी तैरने लगती थी। पास जाकर बैठने पर वह मेरे कंधे पर अपना मुख रख देती थी और अपनी खुरदरी जीभ से मेरी गर्दन चाटने लगती थी।
             लालमणी बेचारे को तो माँ की व्याधि और आसन्न मृत्यु का बोध नहीं था। उसे दूसरी गाय का दूध पिलाया जाता था,अतः अवसर मिलते ही वह गौरा के पास पहुँचकर या अपना सिर मार-मार,उसे उठाना चाहता था या खेलने के लिए उसके चारों ओर उछल-कूदकर परिक्रमा ही देता रहता।
         मैंने बहुत से जीव-जन्तु पाल रखे हैं,अतः उनमें से कुछ को समय-समय असमय विदा देने ही पड़ती है। परन्तु ऐसी मर्मव्यथा मुझे स्मरण नहीं है। I
           इतनी हृ-पुष्ट,सुन्दर,दूध-सी उज्जवल पयस्विनी गाय अपने इतने सुन्दर चंचल वत्स को छोड़कर किसी भी क्षण निर्जिव और निश्चेष्ट हो जाएगी, यह सोचकर ही आँसू आ जाते थे।
                लखनऊ कानपुर आदी नगरों से भी पशु-विशेषज्ञों को बुलाया,स्थानीय पशु-चिकित्सक दो दिन में दो-तीन बारआते रहे,परन्तु किसी ने ऐसा उपचार नहीं बताया जिससे आशा की कोई किरण मिलती। दिरुपाय मृत्यु की प्रतिक्षा का मर्म वही जानता है,जिसे किसी असाध्य और मरणासन्न रोगी के पास बैठना पड़ता हो।
    जब गौरा की सुन्दर चमकीली आँखें निष्प्रभ हो चलीं और सेब का रस भी कंठ में रुकने लगा,तब मैं अन्त का अनुमान लगा लिया। अब मेरी एक ही इच्छा थी कि मैं उसके अन्त के समय उपस्थित रह सकूँ। दिन में ही नहीं? रात में भी कई-कई बार उठकर मैं उसेदेखने जाती रही।
        अन्त में एक दिन ब्रह्ममुहुर्त में चार बजे जब मैं गौरा को देखने गई,तब जैसे ही उसने अपना मुख सदा के समान मेरे कंधे पर रखा,वैसे ही वह एकदम पत्थर जैसा भारी हो गया और मेरी बांह पर से सरकक धरती पर आ रहा। कदाचित् सुई ने हृदय को बेधकर बन्द कर दिया।
        अपने पालित जीव जन्तुओं के पार्थिव अवशेष मैं गंगा को समर्पित करती रही हूँ। गौरांगिनी को ले जाते समय मानो करुणा का समुद्रउमड़ आया,परन्तु लालमणी इसे भी खेल समझ उछलता-कुदता रहा। यदि दीर्घ-निःश्वास का शब्दों में अनुवाद हो सके,तो उसकी प्रतिध्वनि कहेगी 'आह मेरा गोपालक देश!'

MAHATMA GANDHI

Mahatma Gandhi was born on 2nd October 1869 at Porbander. Mohandas Karamchand Gandhi was the full name of "Bapu". We all indians c...